ग्रेटर नोएडा/ भारतीय टॉक न्यूज़: ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की कथित “किसान-विरोधी” नीतियों और वैधानिक अधिकारों की अनदेखी के खिलाफ अब क्षेत्र के किसानों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। वर्षों से अपने शेष 4 प्रतिशत आबादी प्लॉट की बाट जोह रहे 39 से अधिक गांवों के पीड़ित किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज माननीय सुरेंद्र सिंह नागर (राज्यसभा सांसद) से मुलाकात की और उन्हें अपनी समस्याओं का ज्ञापन सौंपा।
सालों का इंतजार और प्राधिकरण की वादाखिलाफी
किसानों का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण के समय ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने जो वादे किए थे, उन्हें जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। प्रतिनिधिमंडल ने सांसद को बताया कि:
🔸 भूमि अधिग्रहण के वक्त 4 प्रतिशत अतिरिक्त प्लॉट देने का लिखित आश्वासन दिया गया था।
🔸 वर्षों बीत जाने के बाद भी आज तक किसानों को इन प्लॉट्स का आवंटन नहीं हुआ है।
🔸प्राधिकरण के इस अड़ियल रवैये के कारण किसान आज आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान हैं।
“हम बार-बार अधिकारियों के चक्कर काटकर थक चुके हैं। प्राधिकरण केवल आश्वासन की घुट्टी पिलाता है, जमीन पर कोई ठोस काम नहीं होता। यह किसानों के अधिकारों को दबाने की सोची-समझी साजिश है।” — प्रतिनिधिमंडल, पीड़ित किसान
सांसद ने दिया मुख्यमंत्री से मिलने का आश्वासन
किसानों की पीड़ा सुनने के बाद राज्यसभा सांसद सुरेंद्र सिंह नागर ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया। उन्होंने किसानों को आश्वस्त किया कि वे जल्द ही इस मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से भेंट करेंगे। उन्होंने कहा कि किसानों का हक उन्हें मिलना चाहिए और वे शासन स्तर पर इस समस्या का प्रभावी समाधान निकालने का पूरा प्रयास करेंगे।
आर-पार की लड़ाई: आंदोलन की चेतावनी
ज्ञापन सौंपने के बाद किसानों ने कड़े शब्दों में प्राधिकरण को चेतावनी दी है। किसानों का कहना है कि यदि उनके 4 प्रतिशत प्लॉट्स का आवंटन जल्द शुरू नहीं किया गया, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। आने वाले दिनों में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ धरना-प्रदर्शन, घेराव और बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह प्रशासन की होगी।
क्या है मुख्य विवाद?
ग्रेटर नोएडा में विकास कार्यों के लिए किसानों की जमीनें ली गई थीं। मुआवजे के अलावा, प्राधिकरण को आबादी के एवज में 6% और 4% के विशेष प्लॉट देने थे। किसानों का दावा है कि 4% वाला हिस्सा अभी भी बड़ी संख्या में किसानों को नहीं मिला है, जिससे वे अपनी पुश्तैनी जमीन खोने के बाद भी अपने कानूनी हक से वंचित हैं।

