रूढ़िवादिता पर चोट, शिक्षा को वोट: नोएडा के गुर्जर बैसोया परिवार ने ‘मृत्यु भोज’ त्याग कर पेश की मिसाल; समाजहित में खर्च होंगे पैसे

नोएडा के बरौला निवासी बादल बैसोया परिवार ने रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक फैसला लिया है। परिवार ने माताजी के निधन पर 'मृत्यु भोज' न कराकर उस पैसे को बच्चों की शिक्षा में लगाने का संकल्प लिया है।

Partap Singh Nagar
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रूढ़िवादिता पर चोट, शिक्षा को वोट: नोएडा के गुर्जर बैसोया परिवार ने 'मृत्यु भोज' त्याग कर पेश की मिसाल; समाजहित में खर्च होंगे पैसे

नोएडा/ भारतीय टॉक न्यूज़: आज के आधुनिक दौर में भी जहाँ समाज में कई तरह की पुरानी और खर्चीली रूढ़िवादी परंपराएं पैर पसारे हुए हैं, वहीं नोएडा से बदलाव की एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहाँ के बरौला गांव के रहने वाले बादल बैसोया परिवार ने शोक की इस घड़ी में एक ऐसा अनुकरणीय और ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिसकी पूरे जिले और सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ हो रही है।

परिवार ने अपनी पूज्य माताजी स्वर्गीग जगमाली जी (पत्नी स्वर्गीय महाराज सिंह, मेजर – पैरा कमांडो) की पावन स्मृति में परंपरागत ‘मृत्यु भोज’ (तेरहवीं/काज) का आयोजन न करने का साहसिक फैसला लिया है।

दिखावे के आडंबर से इतर, शिक्षा को चुना

बैसोया परिवार ने रूढ़िवादिता को दरकिनार करते हुए यह घोषणा की है कि मृत्यु भोज के पारंपरिक आयोजन पर जो भी भारी-भरकम राशि व्यय (खर्च) होनी थी, उसका उपयोग अब जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और समाज कल्याण के कार्यों में किया जाएगा।

इस अनुकरणीय पहल पर बात करते हुए परिवार के सदस्यों ने अपनी भावनाएं व्यक्त कीं: “दिवंगत आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि किसी दिखावे, आडंबर या भारी-भरकम दावत से नहीं दी जा सकती। माताजी को सच्ची श्रद्धांजलि उन्हीं कार्यों से मिल सकती है जो समाज की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को उज्ज्वल और बेहतर बनाएं। शिक्षा से बड़ा कोई दान नहीं है।”

मेजर (पैरा कमांडो) के परिवार ने समाज को दिखाई नई दिशा

गौरतलब है कि यह परिवार देश सेवा से जुड़ा रहा है। स्वर्गीय श्रीमती जगमाली जी के पति स्वर्गीय महाराज सिंह सेना में मेजर (पैरा कमांडो) के पद पर रहकर देश की सेवा कर चुके हैं। ऐसे में इस अनुशासित और जागरूक परिवार द्वारा लिया गया यह प्रगतिशील निर्णय पूरे गौतमबुद्धनगर और आसपास के ग्रामीण समाज के लिए एक मजबूत और सकारात्मक संदेश है।

अक्सर ग्रामीण इलाकों में लोक-लाज या सामाजिक दबाव के चलते गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को भी कर्ज लेकर मृत्यु भोज कराना पड़ता है। ऐसे समय में बरौला के इस प्रतिष्ठित परिवार का आगे आकर इस कुप्रथा को बंद करना एक मील का पत्थर साबित होगा। उम्मीद जताई जा रही है कि इस पहल से प्रेरित होकर आने वाले समय में अन्य परिवार भी फिजूलखर्ची और दिखावे को छोड़कर सामाजिक सरोकारों और शिक्षा से जुड़े फैसले लेने के लिए आगे आएंगे।

इस सराहनीय कदम की सराहना करते हुए क्षेत्र के प्रबुद्ध जनों ने दिवंगत पुण्यात्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है और शोकाकुल परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त की हैं।

 

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