Noida/ Uttar Pradesh/ भारतीय टॉक न्यूज़: अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM-1) मयंक त्रिपाठी की अदालत ने करीब 31 साल पुराने 1,575 रुपये के मनीऑर्डर गबन मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने नोएडा के सेक्टर-19 डाकघर में तैनात रहे उप डाकपाल महेंद्र कुमार को दोषी करार देते हुए तीन साल के कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला अक्टूबर 1993 का है, जब नोएडा निवासी अरुण मिस्त्री ने अपने पिता मदन महतो को समस्तीपुर (बिहार) के लिए 1,500 रुपये का मनीऑर्डर भेजा था।
🔸 गबन का आरोप: उप डाकपाल महेंद्र कुमार ने मनीऑर्डर की राशि (1,500 रुपये) और कमीशन (75 रुपये) सहित कुल 1,575 रुपये प्राप्त किए, लेकिन उन्हें सरकारी खाते में जमा नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने प्रेषक को जाली रसीद जारी कर दी।
🔸 शिकायत: जब प्राप्तकर्ता को राशि नहीं मिली, तो अरुण मिस्त्री ने 3 जनवरी, 1994 को डाक अधीक्षक सुरेश चंद्र से शिकायत की।
🔸जांच में पुष्टि: विभागीय जांच में पाया गया कि रसीद नकली थी और धनराशि सरकारी खाते में जमा नहीं हुई थी।
कोर्ट का फैसला और सख्त टिप्पणी
अदालत ने हापुड़ के पिलखुआ निवासी दोषी महेंद्र कुमार को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग) और 420 (छल) के तहत दोषी माना।
🔸 सजा: तीन साल की कैद और 10,000 रुपये का जुर्माना। जुर्माना जमा न करने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
🔸 अदालत की टिप्पणी: अपने निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ने महेंद्र के खिलाफ आरोपों को ‘युक्ति-युक्त संदेह से परे’ सिद्ध किया है। कोर्ट ने कहा कि “सरकारी सेवक से सर्वोच्च ईमानदारी और निष्ठा की अपेक्षा की जाती है। इस प्रकार के अपराध न केवल सरकारी तंत्र को कमजोर करते हैं, बल्कि जनता के विश्वास को भी आघात पहुंचाते हैं।”
🔸 कानूनी आधार: अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले राम शंकर पटनायक बनाम ओडिसा राज्य (1988) का हवाला देते हुए कहा कि एक बार आपराधिक न्यासभंग का अपराध सिद्ध हो जाने पर बाद में धनराशि लौटाने से अपराध समाप्त नहीं होता।
31 साल लंबी कानूनी लड़ाई
गबन का यह मामला 1993 में हुआ था, जिसकी शिकायत के बाद 8 फरवरी, 1994 को महेंद्र ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए गबन की राशि 1,575 रुपये विभाग में जमा की थी। इसके बाद डाक अधीक्षक की शिकायत पर थाना सेक्टर-20 नोएडा में मुकदमा पंजीकृत हुआ।
आरोप तय: पुलिस की विवेचना के बाद आरोप पत्र दाखिल हुआ और 5 जनवरी, 2001 को महेंद्र पर आरोप तय किए गए, जिनका उन्होंने खंडन किया था।
स्वीकारोक्ति का महत्व: हालांकि दोषी ने गलती स्वीकार कर धनराशि जमा कर दी थी, लेकिन अदालत ने सजा सुनाते समय आरोपी की लंबी सेवा और पारिवारिक स्थिति को ध्यान में रखने के बावजूद लोक सेवक से कानून के प्रति उच्च सम्मान की अपेक्षा को भी रेखांकित किया।
अदालत ने प्राचीन विधि शास्त्री मनु के सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसमें दंड को प्रजा का रक्षक बताया गया है।

