भारतीय टॉक न्यूज़ (कानूनी डेस्क) प्रयागराज / ग्रेटर नोएडा : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा मजदूर प्रदर्शन मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) को निरस्त कर दिया है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया और पुलिस-प्रशासन द्वारा पेश किए गए बयान को ‘मनगढ़ंत कहानी’ करार दिया। इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश जारी किया है, जिसकी वसूली मामले से संबंधित दोषी अधिकारियों व गौतमबुद्धनगर की जिलाधिकारी के वेतन से की जाएगी।
क्या था पूरा मामला?
दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक आकृति चौधरी ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अप्रैल 2026 में नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों ने अपने न्यूनतम वेतन और सुविधाओं की मांगों को लेकर एक बड़ा प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान अचानक स्थिति हिंसक हो गई और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं।
नोएडा पुलिस ने दावा किया था कि आकृति चौधरी और पत्रकार-कार्यकर्ता सत्यम वर्मा ने भीड़ को उकसाकर पत्थरबाजी और आगजनी कराई थी। इसके बाद मई 2026 में आकृति चौधरी के खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेज दिया गया था। वह पिछले करीब पांच महीनों से हिरासत में बंद थीं।
कोर्ट का आदेश: क्या-क्या हुआ
NSA हिरासत रद्द: न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति की हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए NSA डिटेंशन ऑर्डर को क्वैश कर दिया।
तुरंत रिहाई का निर्देश: कोर्ट ने कहा कि यदि आकृति किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
5 लाख मुआवजा: अदालत ने 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया, जो संबंधित अधिकारियों—जिलाधिकारी से लेकर SHO तक—के वेतन से वसूला जाएगा।
राज्य की ‘मनगढ़ंत कहानी’: पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य का केस एक ‘मनगढ़ंत कहानी’ पर टिका था और सबूत के अभाव में हिरासत जायज नहीं ठहरती।
अदालत ने गिरफ्तारी और BNSS की धारा 126 व 130 के तहत नोटिस के क्रम की बारीकी से जांच की। जनरल डायरी के रिकॉर्ड के आधार पर पीठ ने कहा कि प्रक्रिया में विसंगति है—पहले गिरफ्तारी हुई, नोटिस बाद में तैयार हुआ, और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। साथ ही, कोर्ट ने इस बात पर भी संदेह जताया कि 11 अप्रैल को हिंसा का जो वर्णन किया गया, वह घटनाक्रम से मेल नहीं खाता और आकृति ने ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे हिंसा भड़के। पुलिस के दावे के बावजूद कि उसके पास मजबूत वीडियो साक्ष्य हैं, राज्य पक्ष वीडियो पेश नहीं कर सका।
हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि यदि आकृति किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें अविलंब रिहा किया जाए। साथ ही राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले 5 लाख रुपये के मुआवजे की राशि सीधे जिम्मेदार अधिकारियों (जिनमें तत्कालीन डीएम गौतमबुद्धनगर भी शामिल हैं) के वेतन से वसूलने का हुक्म सुनाया।
हालांकि, एनएसए हटने के बावजूद आकृति चौधरी की तुरंत रिहाई संभव नहीं हो सकेगी। नोएडा मजदूर प्रदर्शन के दौरान दर्ज हुई अन्य एफआईआर (FIR) में उनकी जमानत याचिकाएं अभी सत्र न्यायालय और निचले न्यायालयों में लंबित हैं। कोर्ट का विस्तृत लिखित आदेश अभी आना बाकी है, जिसके बाद अन्य मामलों में जमानत प्रक्रिया पूरी होने पर ही पूर्ण रिहाई संभव होगी।
लिखित आदेश सामने आने के बाद अदालत की टिप्पणियों और निर्देशों की पूरी तस्वीर और स्पष्ट होगी।

